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शिक्षा आयोग की मुख्य सिफारिशें | कोठारी आयोग की मुख्य सिफारिशें

शिक्षा आयोग की मुख्य सिफारिशें | कोठारी आयोग की मुख्य सिफारिशें

शिक्षा आयोग, 1964-66 (Education Commission) या कोठारी आयोग

स्वतन्त्रता के उपरान्त शिक्षा का अत्यन्त तीव्रगति से विकास हुआ, परन्तु यह विकास केवल संख्यात्मक या गुणात्मक नहीं। इसके साथ-साथ संविधान में शिक्षा के प्रति किये गये संकल्पों को भी पूरा नहीं किया जा सका । 

इससे शिक्षा क्षेत्रों में असन्तोष प्रकट किया जाने लगा तथा स्वतन्त्रोत्तर भारत में शिक्षा के समन्त पक्षों की विस्तारपूर्वक जाँच करने के लिए एक आयोग के गठन की माँग की जाने लगी। 

सामाजिक आर्थिक व राजनैतिक क्षेत्रों से भी सभी स्तरों की शिक्षा में सुधार करने की माँग की जा रही थी, तब 14 जुलाई सन् 1964 को भारत सरकार ने डा० दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में शिक्षा आयोग के गठन की घोषणा की।  

कोठारी आयोग ने अपने कार्य को पूरा करने के लिये 12 मुख्य कार्य दल तथा 7 सहायक कार्यदल बनाये। इन कार्यदलों ने लगभग 100 दिन तक राष्ट्र के विभिन्न राज्यों के स्कूलों, कालेजों तथा विश्वविद्यालयों का भ्रमण किया तथा लगभग 9000 व्यक्तियों से साक्षात्कार किया। 

आयोग ने 2400 से अधिक लिखित उत्तरों का विश्लेषण भी किया तथा इन सभी सूचनाओं के आधार पर 673 पृष्ठों का प्रतिवेदन तैयार किया जिसे 20 जून 1966 को भारत सरकार को समर्पित किया गया। 

आयोग ने अपने विस्तृत प्रतिवेदन में शिक्षा के विभिन्न पक्षों पर सघन प्रकाश डाला तथा राष्ट्रीय उत्थान में शिक्षा को एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में विकसित करने की दृष्टि से अनेक महत्वपूर्ण सुझाव दिये। 

आयोग के कुछ महत्वपूर्ण सुझाव निम्नवत् थे :


1. शिक्षा के राष्ट्रीय उद्देश्य (National Objectives of Education)


शिक्षा आयोग ने कहा कि शिक्षा का विकास इस ढंग से किया जाना चाहिए कि इससे राष्ट्रीय उत्पादकता में वृद्धि हो, सामाजिक व राष्ट्रीय एकता की भावना बढ़े, आधुनिकीकरण की गति में तेजी आए, तथा सामाजिक नैतिक व आध्यात्मिक मूल्यों का विकास हो।


2. शिक्षा की संरचना (Structure of Education)


आयोग ने शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए शैक्षिक ढाँचे में ऊर्ध्वगामी परिवर्तन करने का सुझाव दिया। आयोग ने एक से तीन वर्ष तक की पूर्व प्राथमिक शिक्षा, दस वर्ष की सामान्य निर्विकल्प शिक्षा, दो वर्ष की विकल्पात्मक उच्चतर माध्यमिक शिक्षा तथा प्रथम उपाधि के लिए त्रिवर्षीय उच्च शिक्षा की अवधि रखने का सुझाव दिया। आयोग ने यह भी कहा कि सम्पूर्ण देश के शैक्षिक ढाँचे में एकरूपता होनी चाहिए।


3. अध्यापकों की दशा (Status of Teachers)


आयोग ने शिक्षकों की आर्थिक, सामाजिक व व्यावसायिक स्थिति सुधारने की सिफारिश कीं। इसके लिए अध्यापकों के वेतनमानों में संशोधन करने, योग्यता पदोन्नति देने, अध्यापक कल्याण कार्यक्रम प्रारम्भ करने, निवास भत्ता सुलभ कराने, अध्यापिकाओं की नियुक्ति को प्रोत्साहित करने, आदिवासी क्षेत्रों में कार्य करने वाले अध्यापकों की विशेष भत्ते देने, शिक्षकों को राजनीति में भाग लेने की स्वतन्त्रता देने, तथा राष्ट्रीय पुरस्कार योजना चालू करने के सुझाव दिये।


4. अध्यापक प्रशिक्षण (Teacher Training)


शिक्षण में गुणात्मक सुधार लाने के लिए आयोग ने सुझाव दिये कि अध्यापक प्रशिक्षण को उन्नत किया जायें, अध्यापकों को अध्ययन की अधिक सुविधाएँ दी जायें, विश्वविद्यालय शिक्षा के पाठ्यक्रम में प्रशिक्षण को स्थान दिया जाये, पत्राचार व अल्पकालीन शिक्षा को बढ़ाया जाये तथा राष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षण विधियों, शिक्षण सामग्री व शिक्षण पाठ्यक्रम में परिवर्तन लायें जाये।


5. शैक्षिक समानता (Educational Equality)


न्याय, समानता व स्वतन्त्रता प्रजातन्त्र के मूलभूत आधार हैं। अतः भारत जैसे प्रजातान्त्रिक ए में सभी नागरिकों को अपनी योग्यताओं का विकास करने के लिए शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार होन चाहिए। 

सरकार के इस दायित्व को देखते हुए आयोग ने कहा कि जाति व धर्म के भेदभाव को सम किया जाये, पुस्तक बैंक की व्यवस्था की जाएँ, छात्रवृत्तियों की संख्या बढ़ाई जाये, आदिवासी बालकों के लिए आवासीय विद्यालयों व तकनीकी शिक्षा की व्यवस्था की जाएँ, नारी शिक्षा को गति दी जाए, विकलांचे की शिक्षा का समुचित प्रवन्ध किया जाये, तथा प्रादेशिक स्तर पर असन्तुलन को दूर करके राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा योजनाएँ बनाई जायें।


6. स्कूल शिक्षा का विस्तार (Expansion of School Education)


पूर्व प्राथमिक शिक्षा के लिए आयोग ने सुझाव दिये कि जिला स्तर पर पूर्व प्राथमिक शिक्षा विकास केन्द्र खोले जायें, पूर्व प्राथमिक शिक्षा का मुख्य उत्तरदायित्व निजी क्षेत्र पर छोड़ा जाये, पाठ्‌यक्रम प्रवृत्ति उन्मुख रखा जाये, महिला अध्यापिकाओं को वरीयता दी जाये तथा ऐसे कार्यक्रम चलाये जायें जिनमें 5 से 6 वर्ष के बालकों को शिक्षा का लाभ मिल सके।


प्राथमिक शिक्षा के सम्बन्ध में आयोग ने कहा कि निःशुल्क व अनिवार्य शिक्षा के सिद्धान्त को चरितार्थ किया जाये, अपव्यय व अवरोधन को कम किया जाये, अधिक पाठशालाएँ खोली जायें तया मजदूर बालकों के लिए विशेष कक्षाएँ चलाई जायें।


माध्यमिक शिक्षा में सुधार के लिए आयोग ने सिफारिशें की कि निम्न माध्यमिक कक्षाओं में स्वचयन विधि से तथा उच्च माध्यमिक कक्षाओं में बाह्य परीक्षा विधि से प्रवेश दिया जाये, माध्यमिक छात्रों को व्यावसायिक विद्यालयों में प्रविष्ट किया जाये तथा नये माध्यमिक विद्यालय खोले जायें।


7. स्कूल पाठ्यक्रम (School Curriculum)


आयोग ने कहा कि ज्ञान के भण्डार में वृद्धि होने के कारण वर्तमान पाठ्यक्रम अनुपयोगी हो गया पाठ्यक्रम में सुधार के लिए आयोग ने कहा कि विश्वविद्यालयों, शिक्षा विभागों, प्रशिक्षण संस्थाओं व राज्य शिक्षा परिषदों को पाठ्यक्रम निर्माण के लिए शोध कार्य करना चाहिए, कक्षा दस तक का पाठ्यक्रम सभी छात्रों के लिए एक समान होना चाहिए, स्कूलों को अपनी आवश्यकतानुसार पाठ्‌यवस्तु बनाने की छूट होनी चाहिए, कक्षा से 4 तक मातृभाषा या प्रादेशिक भाषा, कक्षा 5 से 7 तक दो भाषाएँ तथा कक्षा 8 से 10 तक तीन भाषाएँ अनिवार्य होनी चाहिए, पाठ्यक्रम में कार्यानुभव व समाजसेवा को स्थान दिया जाये तथा छात्रों को नैतिक व अध्यात्मिक शिक्षा दी जानी चाहिए।


8. स्कूल शिक्षा पद्धति (System of School Education)


आयोग की दृष्टि से शिक्षा पद्धति, निर्देशन व मूल्यांकन का शिक्षा के नवनिर्माण में अत्यधिक महत्व है। आयोग ने इस सम्बन्ध में सिफारिश की कि उत्कृष्ट पाठ्यपुस्तकों व अध्यापन सामग्री की व्यवस्था की जानी चाहिए, निर्देशन व विचार-विमर्श शिक्षा के अभिन्न अंग होने चाहिए तथा मूल्यांकन को शिक्षा का अन्तर्निहित अंग होना चाहिए।


9. स्कूल निरीक्षण (School Inspection)


आयोग ने शैक्षिक सुधार के लिए सहानुभूतिपूर्ण तथा क्रियाशील प्रशासनिक तथा निरीक्षण प्रणाली होने की आवश्यकता पर जोर दिया तथा कहा कि निरीक्षण को उपयोगी बनाने के लिए राज्य शिक्षा विभाग का पुनर्गठन किया जाये, विद्यालय संगम योजना को क्रियान्वित किया जाये, शिक्षा अधिकारियों को सेवाकालीन प्रशिक्षण दिया जाये तथा प्रत्येक राज्य में स्कूल शिक्षा परिषदों की स्थापना की जाये।


10. उच्च शिक्षा के उद्देश्य (Objectives of Higher Education)


आयोग ने उच्च शिक्षा के सम्बन्ध में विचार करते हुए कहा कि विश्वविद्यालयों का कार्य, नवीन ज्ञान की खोज करना, जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में नेतृत्व प्रदान करना, विभिन्न व्यवसायों में निपुण नागरिक तैयार करना, समानता व सामाजिक न्याय को बढ़ाना तथा समाज में वांछित मूल्यों का विकास करना है। आयोग ने ऐसे वृहद विश्वविद्यालयों की स्थापना का भी सुझाव दिया जिनका स्तर विश्व के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों के समकक्ष हो। आयोग ने अध्यापन व मूल्यांकन में सुधार करने, प्रादेशिक भाषाओं को उच्च शिक्षा का माध्यम बनाने, छात्र अनुशासन को प्राथमिकता देने की अनुशंसा भी की।


11. उच्च शिक्षा में प्रवेश व कार्यक्रम (Admission and Programme of Higher Education)


आयोग ने रोजगार के अवसरों तथा मानव शक्ति की आवश्यकताओं के अनुरूप ही उच्च शिक्षा के प्रसार का सुझाव दिया। इसके लिये आयोग ने चयनित प्रवेश नीति अपनाने का सुझाव दिया। उपयुक्त प्रवेश विधि का विकास करने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा केन्द्रीय परीक्षण संस्थान की स्थापना करने का प्रस्ताव भी शिक्षा आयोग ने किया। आयोग ने अंशकालीन शिक्षा व नारी शिक्षा के प्रसार, पाठ्यक्रमों के पुनर्गठन तथा शैक्षिक अनुसंधान की आवश्यकता पर भी बल दिया।


12. विश्वविद्यालयों की व्यवस्था (Governance of Universities)


आयोग ने विश्वविद्यालयों को पूर्ण स्वायत्ता प्रदान करने, आर्थिक सुविधाएँ उपलब्ध कराने का सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विश्वविद्यालय स्वायत्तता बनाये रखने व उच्च शिक्षा के उचित विकास के लिए नीति निर्धारण करने सम्बन्धी सिफारिश की।


13. कृषि शिक्षा (Agriculture Education)


कृषि शिक्षा का विकास करने की दृष्टि से आयोग ने कहा कि प्रत्येक राज्य में कम से कम एक कृषि विद्यालय खोला जाये, कृषि पोलिटैक्निकों की स्थापना को वरीयता दी जाये, कृषि शिक्षा को सामान्य शिक्षा का अंग बनाया जाये, कृषि अनुसंधान का दायित्व भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् को सौंपा जाये।


14. व्यावासयिक, तकनीकी तथा इंजीनियरिंग शिक्षा (Vocational, Technical and Engineering Education)


आयोग ने व्यावसायिक पाठ्यक्रमों को रोजगार-उन्मुख बनाने, तकनीकी पाठ्यक्रमों में सुधार करने तथा इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों में प्रत्यक्ष तथा प्रायोगिक कार्य को अधिक महत्व देने का सुझाव दिया।


17. प्रौढ़ शिक्षा (Adult Education)


कोठारी आयोग ने निरक्षरता को दूर करने के लिए प्रौढ़ शिक्षा की सुविधाएँ उपलब्ध कराने की सिफारिश की थी। आयोग ने सतत् शिक्षा व पत्राचार शिक्षा के आयोजन का सुझाव भी दिया। इस हेतु सभी सम्बन्धित मन्त्रालयों व संस्थाओं का प्रतिनिधित्व करने वाली राष्ट्रीय शिक्षा परिषद की स्थापना करके प्रौढ़ शिक्षा का संगठन व प्रशासन करने का सुझाव भी आयोग ने दिया।


18. शैक्षिक योजना तथा प्रशासन (Educational Planning and Administration)


आयोग ने राज्य व स्थानीय स्तर के शैक्षिक प्रशासन में सुधार करने का सुझाव दिया।


19. शैक्षिक अर्थव्यवस्था (Educational Finance)


आयोग ने शिक्षा के आर्थिक स्रोतों व शैक्षिक व्यय पर भी पर्याप्त सुझाव दिए।


निष्कर्ष 

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि शिक्षा आयोग ने शिक्षा के सभी क्षेत्रों के विभिन्न पक्षों पर विस्तृत विचार-विमर्श किया है तथा राष्ट्रीय उत्थान के अनुकूल शैक्षिक वातावरण की रचना करने के लिए अनेक सुझाव सामने रखे हैं। आयोग के प्रतिवेदन का सभी क्षेत्रों में स्वागत किया गया। वास्तव में शिक्षा-व्यवस्था का व्यापक एवं विस्तृत अध्ययन करके उसमें सुधार लाने के लिये सुझाव देने का यह एक भागीरथ प्रयास था। इसी कारण कोठारी शिक्षा आयोग के प्रतिवेदन को भारतीय शिक्षा की गीता भी कहा जाता है।




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